Sunday, October 04, 2009

तत्वग्नान

जो तने धर्मं नु अस्तित्व अनुकूळ न आवतु होय तो निचे कहू छू ते विचारी जजे
१ तू जे स्थिति भोगवे छे ते शा प्रमाण थी छे ?
२ आवति कालनी वात शा माटे जानी शकतो नथी ?
३ तू जे इच्छे छे ते शा माटे मलतू नथी ?
४ चित्र विचित्रता नु प्रयोजन शु छे ?
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पग मुकता पाप छे, जोता ज़ेर छे अने माथे मरण रह्यु छे, ऐ विचारे आजना दिवसमाँ प्रवेश कर ।
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जिंदगी टुकी छे अने जंजाळ लम्बी छे माटे जंजाळ टुकी कर तो सुख रुपे ज़िन्दगी लागसे।
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जो तू स्त्री होय तो तारा पति प्रत्येनी धर्म करणीने सम्भाळ, दोष थयो होय तो तेनी क्षमा याच अने कुटुंब भणि द्रष्टि कर ।
- पूज्य श्रीमद् राजचंद्रजी कृपाळुदेव

Monday, September 21, 2009

चिंतन कणिका

आत्मा ग्नानम स्वयं ग्नानम ग्नानातदन्यत् करोतिकिम
परमावस्य कर्तात्मा मोहोयम व्यव्हारिणाम

-श्रीमद् अमृतचंद्रजी आचार्यदेवजी

Saturday, January 03, 2009

सहजत्मा स्वरुप सर्वग्न देव परम गुरु परम गुरु

सहजात्म स्वरुप सर्वग्न देव परम गुरु परम गुरु।
शिव रमणी रमणी रमणार तू तुही देव नो देव, ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरुदेव, जय गुरु जय गुरु जय गुरुदेव।
-पूज्य श्री श्रीमद राज चंद्रजी के बोल पूज्य गुरुदेवश्री को अत्यंत ह्रदय प्रिय थे

सुखधाम अनंत सु संत चही, दिन रात्र रहे तद ध्यान महि
प्रशांति अनंत सुधामय जे, प्रनमु पद ते वरते जय ते
-प्रषम मूर्ति भगवती माताजी का मुमुक्षुओ को अंतिम संदेश